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“अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और दफ्तरी जीवन का यथार्थ –यारों के यार”

डॉ. विरल पटेल

आमतौर पर सरकारी दफ्तरों का माहौल बोरियत और घुटन से भरा होता है. उसमें भी बाबू पंथी अपनी जिन्दगी खास अंदाज में जीते है. मर्जी मुताबिक काम होता है. ढेरों पड़ी फाइलों में कुछ चमचमाती फाइलों की परत दर परत रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचारी का सबूत देती है. घूस के आभाव में कुछ फाइलों को धूल व दीमक निपटा रही है.

“यारों के यार” लघु उपन्यास में लेखिका द्वारा इसी दफ्तरी जीवन के यथार्थ की सजीव परिणति हुई है. ज्ञातव्य हो कि यथार्थ की अभिव्यक्ति आधुनिक साहित्य की महती दरकार है. “उपन्यास के लिए यथार्थ की खोज का मतलब है यथार्थ के गतिशील रूप की पहचान और संभावनाओं की तलाश. “ 1.

यूँ तो लेखिका अपनी भाषाई अभिव्यक्ति को लेकर सदैव आलोचकों के निशाने पर रही है. खासकर “मित्रों मरजानी” “सूरजमुखी अन्धेरें के”, “यारों के यार” कि भाषा को लेकर. “यारों के यार” उपन्यास में व्यक्ति और व्यवस्था का संघर्ष दर्शाया गया है. जहाँ सरकारी दफ्तर के ऊब भरे जटिल माहौल के यथार्थ को लेखिका ने उजागर किया है. यह उपन्यास अपनी भाषाई शैली के कारण विवादों का विषय रहा है. शुरू से अंत तक सूरी नाम का पात्र अश्लील गालियाँ बकता रहता है. गूं के बालूशाही, माँ के चोदने, चूतियाबहनचोद,चुदक्कड, हगना-मूतना आदि देशी गालियों के खुले प्रयोग ने हिन्दी साहित्य जगत में हलचल मचा दी. अपने सहयोगी अवस्थी की तरक्की पर वह टिप्पणी करता है –“ सरकारी ऑर्डर क्या हुआ घर के जनाने का मनमाना खेल हो गया. जब चाहा लड़की निकाल मारी जब चाहा लड़का. “ 2.

साहित्य में रचनाओं के मूल्यांकन करते ही दृष्टि व्यापक होनी चाहिए, संकीर्ण एवं नियन्त्रित नहीं. क्योंकि साहित्य का असर व्यवहारिक जीवन में संकीर्णता नहीं व्यापकता लिए है. अत: इस प्रकार की अभिव्यंजना शैली को भले ही कुछ आलोचकों ने अश्लील व साहित्य के लिए अनुपयुक्त माना है. लेकिन वह इस सत्य को कतई नकार नहीं सकते कि परिवेशगत चित्रण में वो भी यथार्थ चित्रं में रचनाकार के समक्ष भाषाई श्लीलता अश्लीलता की योजना किसी भी दर्जे में स्थान नहीं पाती न प्राथमिक न द्वितीय, वहां तो प्राथमिकता केवल परिवेश व कथ्य के यथार्थ चित्रण की होती है.

“ यह रचना अश्लील नहीं थी क्योंकि उसमें गालियों का प्रयोग परिवेश के चित्रण के लिए किया गया था. विकृत मानसिकता का प्रोत्साहन के लिए नही. “ 3.

सरकारी दफ्तरों का वातावरण जिसमें अफसरों और ठेकेदारों के बीच रिश्वत और भ्रष्टाचारी की जुगलबन्दियाँ आम बात है. इसके विरुद्ध आवाज उठाना मुसीबत मोल लेने के बराबर है. यही कारण है कि साधारण दर्जे के क्लर्कों का मन कुण्ठा, निराशा और नफरत से भरा रहता है. सूरी जैसे लोग अपने मन में नफरत और कुण्ठा से भरी ज्वालामुखी को गालीनुमा भाषा द्वारा अभिव्यक्त करते है. सोबती जी ने दफ्तर के साधारण कोटि के क्लर्कों की मानसिकता को इस उपन्यासकार ने परिणित किया है. उसके लिए उन्होंने उपयुक्त भाषा का चयन किया है. लेखक का काम पाठकों के अनुसार लेखन करना नही होता है. अभिव्यक्ति के लिए परिवेश के अनुकूल भाषा एवं कथ्य के चयन के लिए वह स्वतंत्र है.

“समाज ने स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाली जो संस्थाएँ  ईजाद की है, सच्चा लेखक उनके आगे जवाबदेह नही होता. क्योंकि वह उन संस्थाओं का निर्मित नही अपितु स्वयम्भू होता है. “ 4

नारी प्रधान उपन्यासों से एकदम परे हटकर “यारों के यार” उपन्यास लेखिका का अनोखा प्रयोग है. ओहदे का रौब और बाबूओं की बेबसी के बीच का जीवंत चित्रण लेखिका ने किया है.

दफ्तरों में सारा खेल कुर्सी और ओहदे का है जिस पर तरक्की मिल जाए तो बात ही बन जाती है. मगर वह आसान नहीं उसके लिए साहबों की जेब गरम करनी पड़ती है.अवस्थी कि तरक्की को लेकर “सूरी ने तेश में आ कुर्सी पर ही फसक्कड़ा मार लिया,”सरकारी दूरबीन का इल्म मुझे भी है. पर जो टून्टी और टंकी की सप्लाई के बन्दोबस्त यार लोगों ने कर रखे है…….वहां तो चालू है नगद नारायण. 5.

इसी तरह “यारों के यार” उपन्यास में घूसखोरी के कई तरीकों पर से भी पर्दा उठाया गया है. घूस में लड़कियों की भी सप्लाई होती है. लेखिका ने इस पर भी पात्र सूरी के माध्यम से पर्दा उठाया है. “सरदार हजार सिंह जिस तरह का एक व्यक्ति है जो अपनी स्वार्थपूर्ति के लक्ष्य में अफसरों को अच्छी पार्टी और अच्छी लड़कियों कि सप्लायी करते है. दफ्तर के अधिकांश अफसर अपने सम्पर्क और घुंस से ऊँचे पद प्राप्त कर लेते है. 6.

दफ्तर के एक अनंत रिश्वत लोभी हेड क्लर्क भवानी पर सूरी के माध्यम से गालियों से तीक्ष्ण टिप्पणी की है. “ भवानी बाबु के बेटे की एक दुर्घटना में मृत्यु होती है. बेटे की मृत्यु होने पर परिवारवालों के मना करने पर भी वह दफ्तर पहुँचता है. क्योंकि उसकी कुर्सी पर खतरा अब भी है. सूरी अफसर के बारे में कहता है “ चूतिया, साला, किस्तों की कार में लट्टू बना घूमता है, बहनचोद. किसी दिन हराम का चूना झाड़ने पर आ गया तो सारी चिनारी धरी राह जाएगी..” 7

अपने उपन्यासों में भाषा के अश्लील प्रयोग को लेकर हुई टिप्पणियों पर अपनी भाषा के संदर्भ में एक जगह लेखिका ने लिखा है कि – “जबान ऐसी कि पानी की तीरह बहती चली जाये. हर शब्द से एक स्थिति बने. एक तस्वीर उभरे. यहाँ तक कि गालियाँ भी उसके “अंडर करेन्ट” को उद्वेलित करे,” 8.

अत: निष्कर्ष में हम कह सकते है कि – वर्तमान दौर में सरकारी दफ्तरी दुनिया की जो वास्तविकता है. जो दफ्तरों में भी आपस में देशी गालियों का भाषाई प्रयोग होता है. उस पर लेखिका ने पूर्ण साहस से अपनी कलम चलाई है. और कई तरह के विरोध के बावजूद “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और दफ्तरी जीवन का यथार्थ –यारों के यार” आज भी चर्चित है और एक मिसाल कायम करता है.भाषाई प्रयोग के क्षेत्र  इसका अपना एक अलग स्थान है.

संदर्भ –

  1. मैनेजर पांडेय, भाषा, जनवरी 1999 पृष्ठ 27
  2. कृष्णा सोबती, यारों के यार, पृष्ठ 45
  3. श्यामचरण दुबे, परम्परा, इतिहास बोध और संस्कृति, पृष्ठ- 131
  4. डॉ. मस्तराम कपूर, अस्तित्ववाद से गांधीवाद तक, पृष्ठ- 144
  5. कृष्णा सोबती, यारों के यार, -49-50.
  6. कृष्णा सोबती, यारों के यार, पृष्ठ- 61
  7. कृष्णा सोबती, यारों के यार पृष्ट 61
  8. कृष्णा सोबती, हम हसमत, पृष्ठ 259

                                              डॉ. विरल पटेल

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