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कविता

कविता

  1. संवेदना

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परिपथ से राजपथ तक

दिखाई पड़ती है संवेदना

किसी मचलती तारिका की तरह

अपनी अदाओं से

उत्तेजना फैलाती

संवेदना जो पूरी तरह बदल गई है वेश्या में

लगाती है अपनी कीमत

त्रिवर्ग की सिद्धि में लगे लोग

बोली लगा खरीदते है

और संवेदना चल देती है उनके साथ

दुकान चमकाने

घटना हतप्रभ हो देखती है तमाशा

उसकी चीड़ फाड़ में लगा समाज

संवेदना पर लिखता है इतिहास

विशेष बन संवेदना

इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होती है

बिछती है नेता,अभिनेता,कवि,कलाकार

के बिस्तर पर

रूपजीवा की भाँत बिस्तर बदलती

ये पूरे करती है मनोरथ

घटना किसी अंधेरे कोने में

मुंह छिपाये सुबकती है

संवेदना पण्यस्त्री बन

बैठ जाती है फिर बाज़ार में।

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डॉ किरण तिवारी, 13 टेम्पल रोड,भोगल, नई दिल्ली- 110014

२.. सुनो परदेसी !

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वो जहाँ हम मिलते थे

खेत कितने होते थे हरे पीले

और किसान कितने होते थे खुश

गुड की मीठी खुशबू हवा में तैरती

चिपक जाती थी हमारे चेहरे पर

उसका जायका जैसे कच्ची उम्र का हमारा प्रेम

खेत के बीचो बीच खड़ा वो बिजूका

जिसके न जाने कितने नाम रख छोड़े थे तुमने

जिसे देख कर हमारे साथ साथ

धान लगाती बालाएं कितना हँसी थी परदेसी

गेंहूँ की हरी हरी बालियाँ जब झूमती थी

तब मैं भी इठलाकर वैसी ही

चूनर लाने की तुमसे जिद्द करती थी

और बदले में तुम हँस कर

लगा के एक चपत

दिखा के फूल चंपा का कहते

वैसी चूनर होनी चाहिए तेरे लिए

और लजा के मैं

तुम्हारी लाई हरी पीली चूड़ी कलाई में घुमाने लगती

पर अब परदेसी

यहाँ के खेत धानी चूनर नहीं ओढते

न मिलती है किसी गोरी को चंपई चूनर

और गुड की मिठास सिर्फ रह गई है यादों में

किसान  मुरझाए हुए पीले चेहरे के साथ

विजूका हो गए हैं

अपनी फ़सल का मुआवजा मांगते मांगते

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डॉ किरण तिवारी, 13 टेम्पल रोड,भोगल, नई दिल्ली- 110014

बोधि कृष्णा जी की कविताएँ

  • ..जलाओ दीये

जलाओ दीये

बिना इस फ़िक्र के

कि अँधेरा धरा पर

कितना और कहाँ है,

अँधेरे और रोशनी का

साथ पुराना यहाँ है..

अँधेरों की गोद में ही

रोशनी का मज़ा है,

सब है उसकी रज़ा से

और उसकी रज़ा में ही

अपनी भी रज़ा है..

सजने दो दीयों का

एक अनूठा मेला,

रह न जाये कोई

अलग और अकेला..

किरणों की उँगलियाँ

दुलराती रहें जिस्म को

और फूल बनती रहें

संभावनाओं की कलियाँ,

जगमगाती रहें भीतर

और बाहर की गलियाँ……

– बोधि कृष्णा

4.. फासले

फासले का फलसफा रहा,

मगर फासला दरम्यां

हमारे कभी रहा ही नहीं..

बात सब हो ही गयी,

मगर एक लफ्ज भी

हमने कभी कहा ही नहीं..

इस पार से उस पार तक

उफनते दरिया के बीच

कच्ची मिट्टी का पुल था

जो कभी ढहा ही नहीं..

सब बहता रहा था यहाँ

मगर फिर भी कुछ था,

जो कभी बहा ही नहीं..

अफ़साने बने और मिटे,

हर निशान मिट गया,

मगर हमारे निशानों से

उगा था एक अफसाना

जिसकी इंतहा ही नहीं..

निगाहे हद में न हो जो

ऐसा कोई जहां ही नहीं……

– बोधि कृष्णा

 

5.. सेवा जल

वक्त भी ढूढने लगा है

सहारों को

जो जिंदगी के थपेड़ों में

हो चुके गुम ।

ऐनक ,लकड़ी के सहारे

डगमगाते कदम

बताने लगे है अब

उम्र को दिशा ।

दूरियों से पनपते रिश्ते

भ्रमित हो जाने लगे

अपनों में ।

वे रिश्ते ही अब

पाना चाहते सुखद छांव

आसरों के वृक्ष तले

सच तो है

क्योंकि वे ही दे सकेंगे

आशीर्वाद के मीठे फल

जिन्होंने उन्हें सींचा होगा

सेवा के जल से ।

संजय वर्मा “दृष्टि “

6.. उस बचपन से तू मिला दे मुझे..

पलकों पे पला नटखट सा रहा

माटी के अंगना खेला मैं,

क्या माँ पापा और क्या बहना

करता था सब से अठखेलियां मैं,

हर जिद मेरी पूरी होती,

लाडला जो था सबका मैं,

जब बढ़ने लगा तो सवाल उठे,

उड़ते लम्हों में वो पल आया,

जवानी की दहलीज पे खड़ा मैं,

पल भर अन्जाने में ऐसा लगा,

जैसे हो गया फिर से अकेला मैं,

अगले दिन आँख खुली खुद को,

इक नयी जगह पाया मैंने,

ता उम्र यहीं से सवेरा है,

दिल को ये समझाया मैंने,

पहले दिन ही अरमानो को,

ख़्वाबों का पंख लगाया मैंने,

पलकें मूंदी और पल भर में,

खुद को उड़ता पाया मैंने,

छोड़ पुरानी यादों को

गुज़रते वक़्त के संग संग,

हर नया किरदार निभाया मैंने,

कितना अरसा बीत गया,

सब कुछ सपना सा लगता है,

मैं खुद में हूँ या हूँ भी नहीं,

तनहापन अपना लगता है,

खुद का वजूद कहीं ग़ुम तो नहीं,

आईना देख के बोले मुझे,

क्या हुआ तुम्हे ये तुम तो नहीं,

कोशिश करता हूँ हर लम्हा,

उम्मीदों को मैं निभा पाऊँ,

अपने नाज़ुक से कन्धों पे,

सुख दुःख का बोझ उठा पाऊँ,

फ़रियाद खुदा में करता हूँ,

कुछ पल का सुकून दिला दे मुझे,

इस जद्दो-जहद में खो जो गया,

उस बचपन से तू मिला दे मुझे,

उस बचपन से तू मिला दे मुझे……

  • कपिल जैन

7.. बचपन

अपने अंदर के

बच्चे का गला घोंटकर

हम इतने बड़े

क्यूँ हो गए………………।

दूर कहीं

बैठी है छिपकर

दोस्तों की किलकारी

दीपावली पर

पटाखों की दुनियां

होली पर पिचकारी

बस्ते स्कूल के

कहाँ गुम हो गए

अपने अंदर के

बच्चे का गला घोंटकर

हम इतने बड़े

क्यूँ हो गए………………।

मचलता है दिल

आज भी

बालदिवस मनाने को

फिर वही

बच्चों का जमघट

कोलाहल मचाने को

चीख ,पुकार के बादल्

मौन क्यों हो गए

अपने अंदर के

बच्चे का गला घोंटकर

हम इतने बड़े

क्यूँ हो गए………………।

भूल गए

गर्मियों की छुट्टी

गांव का जीवन सभी

काम के आगे दबी

सम्भावना मन में उठी

बीज भोलेपन के

थोथे क्यों हो गए

अपने अंदर के

बच्चे का गला घोंटकर

हम इतने बड़े

क्यूँ हो गए…………..।

      नीरज पाराशर

8.. बचपन की यादे

बचपन का जमाना था

खुशियो का खजाना था

ना थी कुछ सुबह की खबर

न शाम का ठिकाना था

सुबह स्कूल जाना था

थककर शाम को आना था

फिर भी खेलने को जाना था

दादी मा की कहानी थी

परियो का फसाना थ

बारिश मै कागज की नाव थी

हर मौसम सुहाना था

रोने की वजह न थी

न हसने का बहाना था

चाहत चांद को पाने की थी

पर दिल तितली का दिवाना था

क्यू हो गये हम इतने बड़े

इससे अच्छा तो वो

बचपन का जमाना था

                                ज्योति सोनी

9 .. एक कतरा ! सांस………………

एक कतरा “शुद्ध” सांस ले लेने दो

हक की हकीकत में………………

क्या ! मयस्सर होगी………………..!

कैसे ! जिये!दूषित-प्रदूषित “हवा”से…………….

हवा !हवा!हो गई हवा में…………..!

“जी” भर ! गया है आंखें नम है

सांसे ! कम है…………..

फिर !भी जी रहे हम हैं…………….!

“दो” पल -दो ! चैन-सुकून से

जीने के लिए…………….

अब! तो “सांसे”भी कम हैं………. !!

कांक्रीट !के जंगल दर जंगल उगाए ! चैन और सुकून के लिए

कृतिमहरियालीअप्रतिम सौंदर्य है

लगता तो “जीवांत” है …………..!

सच !कँहूं तो “जीवन”का अंत है

अपने ही हांथों अपनों का …………….

ये ! कैसा अंत है ………………..

अंनत है………………!!

सांस लेना “दूभर ” है …………….

एक “कतरा-शुध्द”सांस ले लेने दो

हक़ की हक़ीक़त में……………. !

क्या ! मयस्सर होगी………………???

यूं !तो सारा शहर “ज़हर”से ज़हरीला  है…………..!

कहर !में दो बोल मीठे कोई सुनाता नहीं ……….!!

एक कतरा ! सांस अपने-अपनो

के लिए सपनों में नहीं  …………!

हक़ीक़त में “वसीयत”के लिए

एक क़तरा! सांस !ले ! लेने दो…. !!

बी..डी.. गुहा रायपुर छत्तीसगढ़

10 .. क्यूं इतने बडे हो गए ——

आज फिर यादों ने रूलाया है,

       बचपन फिर दिल में छटपटाया है ..

बेफिक्र सी जिन्दगी,चैन की रातें,

बंद मुठ्ठी के सपने, खुद से की बातें ..

मां के आंचल में छुपना,

  पिता के कांधों पर झुलना ..

सोते हए वो नींद में सुबकना

खुद से बातें करतें हुए खो जाना ..

वो मां का आवाज लगाना,

और खाना अपने हाथों से खिलाना ..

पापा की नाराजगी से सहमना,

फिर मानने के लिये नखरे दिखाना ..

स्कूल की वो बेफिक्र मस्ती,

टीचर से फिर सजा पाना ..

सखियों की खुसर -पुसर,

और मुंह दबा हंसी छिपाना ..

खट्टी ईमली की वो सिहरन,

चुपके से पडौसी के आम चुराना ..

क्या वो बचपन था सुहाना,

आज लगता है सब कुछ बेगाना ..

अब जिद भी अपनी, सपने भी अपने,

बस दिल में यादो का दीप जलाना ..

मंजिलो को ढूंढते हुए हम कहां खो गए,

पता नही क्यूं हम इतने बडे हो गए ..

                                            गीता दुबे

कविता

मानव तू भाग रहा है बहुत तेज

मगर तेरी दिशा गलत सो प्रतिशत

तू भाग रहा है कब्रिस्तान की ओर

परन्तु तुझे जिंदगी की तलाश है

मानव तू भाग रहा है बहुत तेज

खजाने की खोज में बेचैन घबराहट में

मगर तेरी दिशा गलत है सो प्रतिशत

 तुम को खुशी की जरूरत है दोस्त

मानव तू भाग रहा है बहुत तेज यार

मयखाने की तलाश में नशे की और

मगर तेरी दिशा गलत है सो प्रतिशत

तुझे हौश और हवास की सख्त जरूरत

मानव तू भाग रहा है बहुत तेज दोस्त

नादानियों की ओर शरारत की और

तू चक्कर घिन्नी सा घूम रहा दिन रात

परन्तु तुझे बुध्दि  की सख्त जरूरत है

तू भाग रहा राजशाही ठाट  आलस्य

ओर न जाने कितने सपने की ओर

मगर तेरी दिशा गलत है सो प्रतिशत

तुझे खून पसीना बहा ने की आवश्यकता

मानव तू भाग रहा बहुत तेज है यार

तू भाग रहा है युद्ध हिंसा की ओर

मगर तेरी दिशा गलत है सो प्रतिशत

तुझे अमन और शांति की जरूरत

मानव तू  आशियाने को सजा रहा है

 सजावट की सो चीज खरीदने रहा

मगर तेरी दिशा गलत है सो प्रतिशत

तुझे सुख दुःख बाट ले ऐसे चार लोग बौना मानव तू भाग रहा है बहुत तेज

मगर तेरी दिशा गलत है सो प्रतिशत

  • अल्का जैन

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