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अनुदित गज़ल गज़ल गज़ल गज़ल

ग़ज़ल

  1. ग़ज़ल

मैं हूँ नादान  मुझे  नादान  रहने दो

सियासत से दूर  गिरेबान रहने  दो

नहीं चाहता कि दाग दामन में लगे

मैं हूँ  शायर  यही  नाम  रहने   दो

करता हूँ हिफाज़त अपने वतन की

मैं हूँ गुमनाम तो  गुमनाम  रहने  दो

राह-ए-उल्फ़त से ना भटकाओ मुझे

वतन में मोहब्बत की पहचान रहने दो

हिन्दू मुस्लिम ऊंच नीच सबकुछ करो

पर हिंदुस्तान को  हिंदुस्तान  रहने  दो

अमीर हमज़ा

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  1. गज़ल

 

लफ़्ज़ बनकर जो तख़य्युल में उतरते होंगे

फूल जैसे मेरी ग़ज़लों में महकते होंगे

 

मेरी आँखों में जो दिन रात झलकते होंगे

वो बड़ी दूर से तन्हा ही चमकते होंगे

 

आइना सामने रख कर जो संवरते होंगे

आप ही आप वो अपने में सिमटते होंगे

 

आपका हुस्न ये अंदाज़ ये शोखी तौबा

आप ही आप तो महफ़िल में चमकते होंगे

 

फूल भी झूमते होंगे ये यक़ी है उस पल

सैर करने वो जो गुलशन में निकलते होंगे

 

देखकर तुझको मेरी बाँहों में ऐ जाने-जहाँ

चाँद तारे भी तो हसरत से मचलते होंगे

 

बस यही सोच के दुश्वार है जीना मेरा

मेरे जैसे ही कहीं वो भी तड़पते होंगे

 

ज़िक्र *साग़र* जो मेरा बज़्म में आया होगा

कुछ बड़े लोग तो  शोलों से दहकते होंगे

 

विनय साग़र जायसवाल

 

 

 

 

 

  1. भागती जिंदगी

 

मौत के खौफ से भागती जिंदगी

खौफ के खौफ से भागती जिंदगी ।

 

कैसे कह दूं उसे वो सितमगर नह

एक एक कौर को ताकती जिंदगी ।

 

अंधेरा इस तरह हर सूं छा गया

रौशनी के लिए झाँकती जिंदगी ।

 

चाहे सन्नाटे हो या की अंधेरे हो

आपके साथ को चाहती जिंदगी ।

 

दिल की धड़कने बोझ थी बन रही

एक एक साँस को थामती जिंदगी ।

 

संग हवाएं भी थी दिल मे तूफान था

एक एक पल को आँकती जिंदगी ।

 

सुशीला जोशी

मुजफ्फरनगर

 

 

 

 

 

 

  1. ग़ज़ल

 

बिन तुम्हारे सनम हम तो डर जायेगे

पानी बिन मछली से जान मर जायेंगे

 

पूरी करने तेरी ख्वाहिशों को सनम

टूटकर पत्तो से हम तो गिर जायेगे

 

यूँ गिरेबाँ पकड़ न हिलाओ प्रिये

प्यार के पुष्प मुझसे तो झर जायेंगे

 

जब पुकारो की तुम नाम लेकर मुझे

छोड़ मंजिल सभी हम ठहर जायेंगे

 

हां उछालो मगर ध्यान से ए हसीं

दिल तो दर्पण है गिर कर बिखर जायेंगे

 

प्यार से पत्थर को जो छू ले  प्रिये

वो तो ढल मूर्ती में निखर जायेंगे

 

राधा कान्हा सा तुम प्यार करले ऋषभ

जग के दिल में तो खुद ही उतर जायेंगे

 

ऋषभ तोमर ‘राधे’

अम्बाह मुरैना

 

 

 

 

 

दबे पावों मेरे दिल तक तुम्हारी याद आई है

मेरी आँखों को नम करती कोई बदली ले आई है

 

हां गम भी है, हँसी भी है मेरे जीवन मे जीवन सी

सुना जब नाम तेरा तो खुशी होठों पे छाई है

 

तुझे कैसे भुला दूँ मैं समझ कुछ भी नही पाउँ

क्योंकि प्रतिबिंब में मेरे दिखे तेरी परछाई है

 

तुम्हारी याद में जलता ये दिल देखा तो ये जाना

मेरे दिल दीप की शायद अभी दिवाली आई है

 

ये आलम है दिवाली का सजी दीपों की माला है

तुम्हारे बिन हमारे घर यहाँ फिर भी तन्हाई है

 

जो खेली संग बचपन मे रही साथी जो कॉलेज में

भारी महफ़िल में वो लड़की यहाँ मैंने तो गाई है

 

सदाकत है ये दुनियाँ की ऋषभ सब कुछ बराबर है

कि बचपन बाद ज्यो आती बहन की विदाई है

 

ऋषभ तोमर ‘राधे’

अम्बाह मुरैना

 

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